शेर-ओ-ग़ज़ल
Tuesday, 5 April 2016
सफ़र
कुछ अनजाना होने का
डर क्यों था
सफ़र में ये ज़द सफ़र
जाने क्यूँ था
जो बर सफ़र हैं
वही हमसफ़र हैं
तेरा साथ ही मुख़्तसर
जाने क्यूँ था
जो मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए था
उसी से बिछड़ने का
डर जाने क्यूँ था
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment