जो हैं बंद कब से वो घर बोलते हैं,
गुनाहों में भीतर के डर बोलते हैं.
जो हैं बोलने वाले सच्चाईयों के,
जुबां कट भी जाए मगर बोलते हैं.
हवा जब गुज़रती है तन्हाईयों से,
नदी के किनारे शजर बोलते हैं. शजर=पेड़
परिंदों को मंजिल मिलेगी यक़ीनन,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं.
इन्हें आबो-दाना है मिलता जिधर से ,
ये पंछी हमेशा उधर बोलते हैं.
वही लोग रहते हैं ख़ामोश यारो,
ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं.
बुलंदी पे कितने थे उनके इरादे,
ये काटे हुए उनके सर बोलते हैं.
ये कैसी अजब बस्तियां हैं शहर की,
ना आपस में जिनके बशर बोलते हैं
गुनाहों में भीतर के डर बोलते हैं.
जो हैं बोलने वाले सच्चाईयों के,
जुबां कट भी जाए मगर बोलते हैं.
हवा जब गुज़रती है तन्हाईयों से,
नदी के किनारे शजर बोलते हैं. शजर=पेड़
परिंदों को मंजिल मिलेगी यक़ीनन,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं.
इन्हें आबो-दाना है मिलता जिधर से ,
ये पंछी हमेशा उधर बोलते हैं.
वही लोग रहते हैं ख़ामोश यारो,
ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं.
बुलंदी पे कितने थे उनके इरादे,
ये काटे हुए उनके सर बोलते हैं.
ये कैसी अजब बस्तियां हैं शहर की,
ना आपस में जिनके बशर बोलते हैं

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