इन्तहा तक मैं मेरे आग़ाज़ को ज़िंदा रखूं, इन्तहा=अंत.....आग़ाज़ =शुरुआत
ये मेरा अंदाज़ है अंदाज़ को ज़िंदा रखूं.
जो इबारत वक़्त ने लिक्खी है मेरे खून से,
मैं उसे ग़ज़लों के हर अल्फ़ाज़ में ज़िंदा रखूं.
मैं नहीं पहचान पाऊं रुख़ हवाओं का भले ,
हाँ मगर जब भी उडूं परवाज़ को ज़िंदा रखूं.
हाथ वो जिससे तराशा था उसे काटे गये,
शर्त फिर भी ये है कि मुमताज़ को ज़िंदा रखूं.
बुझदिलों कि बात चाहे कह नहीं पाऊं मगर,
हर्फ़ बन तारीख़ का जाँबाज़ को ज़िंदा रखूं.
मैं जुबां गिरवी नहीं रखूँगा चाहे काट लो,
जब तलक़ ज़िंदा हूँ इस आवाज़ को ज़िंदा रखूं.
एक वो लम्हा कि जब मैं आरज़ू तेरी बनूँ,
उस घड़ी तक तो दिले-नासाज़ को ज़िंदा रखूं.
ये मेरा अंदाज़ है अंदाज़ को ज़िंदा रखूं.
जो इबारत वक़्त ने लिक्खी है मेरे खून से,
मैं उसे ग़ज़लों के हर अल्फ़ाज़ में ज़िंदा रखूं.
मैं नहीं पहचान पाऊं रुख़ हवाओं का भले ,
हाँ मगर जब भी उडूं परवाज़ को ज़िंदा रखूं.
हाथ वो जिससे तराशा था उसे काटे गये,
शर्त फिर भी ये है कि मुमताज़ को ज़िंदा रखूं.
बुझदिलों कि बात चाहे कह नहीं पाऊं मगर,
हर्फ़ बन तारीख़ का जाँबाज़ को ज़िंदा रखूं.
मैं जुबां गिरवी नहीं रखूँगा चाहे काट लो,
जब तलक़ ज़िंदा हूँ इस आवाज़ को ज़िंदा रखूं.
एक वो लम्हा कि जब मैं आरज़ू तेरी बनूँ,
उस घड़ी तक तो दिले-नासाज़ को ज़िंदा रखूं.
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