कहाँ टूटे हुए घर बोलते हैं,
फ़क़त भीतर छिपे डर बोलते हैं.
अगर तुम रूह से सुनने लगो तो,
ज़माने भर के मंज़र बोलते हैं.
वहां कैसे अदा होंगी नमाज़ें,
जहाँ पत्थर से पत्थर बोलते हैं.
बदन है याद की वीरां हवेली,
जहाँ दुःख के कबूतर बोलते हैं.
न मुझको मान तू सहरा कि मुझमें,
कई प्यासे समंदर बोलते हैं.
गुज़र कर जंगलों से देख तू भी,
परिंदे हमसे बेहतर बोलते हैं.
फ़क़त भीतर छिपे डर बोलते हैं.
अगर तुम रूह से सुनने लगो तो,
ज़माने भर के मंज़र बोलते हैं.
वहां कैसे अदा होंगी नमाज़ें,
जहाँ पत्थर से पत्थर बोलते हैं.
बदन है याद की वीरां हवेली,
जहाँ दुःख के कबूतर बोलते हैं.
न मुझको मान तू सहरा कि मुझमें,
कई प्यासे समंदर बोलते हैं.
गुज़र कर जंगलों से देख तू भी,
परिंदे हमसे बेहतर बोलते हैं.
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