Friday, 18 March 2016

अजनबी हूँ आज कल

अजनबी हूँ आज कल अपना लगूँ,
रफ़्ता-रफ़्ता क्या पता अच्छा लगूँ.
रेत जितनी प्यास ले कर तुम मिलो,
हूँ तो सहरा पर तुम्हें दरिया लगूँ .
सल्तनत अहसास की तुमको मिले,
मैं तुम्हें जागीर का हिस्सा लगूँ.
बंद करके आँख जब देखूं तुम्हें,
तब सुबह देखा हुआ सपना लगूँ.
गर मुझे महसूस दिल से कर सको,
प्यार का बहता हुआ झरना लगूँ.
प्यास में मेरे अजब तासीर है,
मैं समंदर हूँ मगर प्यासा लगूँ.
मुझको खो कर ज़िन्दगी में जब मिलो,
क्या पता तुमको मैं तब कैसा लगूँ.

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