चांदनी, बादल, हवा, दरिया समझता था,
प्यार के जज़्बात को क्या-क्या समझता था.
वो मेरी शाख़ों पे ठहरा तो कभी होगा,
वरना पंछी क्यों मुझे अपना समझता था.
सब जिसे मासूम सा बच्चा समझते थे,
वो उसे पर चाँद का टुकड़ा समझता था.
वो लगा इस बार मुझको अजनबी जैसा,
मैं जिसे अपना ही इक चेहरा समझता था.
उड़ सका ना वो परिंदा उम्र भर ऊंचा,
घौंसले को सिर्फ़ जो दुनिया समझता था.
उम्र भर गुज़रा किया पर ना ठहर पाया,
वो मुझे जैसे कोई रस्ता समझता था.
वो मुझे अपनी तरह सूखी नदी समझा,
मैं जिसे अपनी तरह गहरा समझता था.
प्यार के जज़्बात को क्या-क्या समझता था.
वो मेरी शाख़ों पे ठहरा तो कभी होगा,
वरना पंछी क्यों मुझे अपना समझता था.
सब जिसे मासूम सा बच्चा समझते थे,
वो उसे पर चाँद का टुकड़ा समझता था.
वो लगा इस बार मुझको अजनबी जैसा,
मैं जिसे अपना ही इक चेहरा समझता था.
उड़ सका ना वो परिंदा उम्र भर ऊंचा,
घौंसले को सिर्फ़ जो दुनिया समझता था.
उम्र भर गुज़रा किया पर ना ठहर पाया,
वो मुझे जैसे कोई रस्ता समझता था.
वो मुझे अपनी तरह सूखी नदी समझा,
मैं जिसे अपनी तरह गहरा समझता था.

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