Friday, 18 March 2016

हैं सारे ही ख़ूनी मंज़र नए ज़माने में

हैं सारे ही ख़ूनी मंज़र नए ज़माने में ,
मुँह में राम बगल में ख़ंजर नए ज़माने में.
दो मुँह के बच्चे जनती हैं अब माएँ अक्सर ,
कहाँ शेर होते हैं बब्बर , नए ज़माने में .
अपने पंख कटा कर पंछी खुश हैं पिंजरे में ,
आसमान में उड़ते पत्थर , नए ज़माने में .
इंसानों की खाल ओढ़ कर बड़ी सभ्यता से,
घूमा करते कई जानवर, नए ज़माने में .
मरूथल में दिखती हैं नदियाँ प्यासे हिरणों को,
धोका खाती आँखें अक्सर, नए ज़माने में.
पैदा होकर कोई मसीहा जब तक न आए,
ख़ामोशी है सबसे बेहतर , नए ज़माने में.

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