Friday, 18 March 2016

तेरे वज़ूद से ना ख़ुद को मैं जुदा देखूं

तेरे वज़ूद से ना ख़ुद को मैं जुदा देखूं ,
सिवा मैं तेरे भला किसका आसरा देखूं.
वो मुझसे कह के गया है कि अब न लौटेगा ,
मगर ये कहता है दिल ,फिर भी रास्ता देखूं.
मैं उस मुक़ाम पे पहुंचा हूँ अब इबादत के,
नहीं ये ख्वाईश रही है कि मैं ख़ुदा देखूं.
भले ही रातें मेरी टूट कर भी जुड़ जाएँ,
मगर ना चाहूँ कभी ख्व़ाब दूसरा देखूं.
सभी ने कह तो दिया है कि बच ना पायेगा,
अब उसको देके कोई दिल से मैं दुआ देखूं.
उसे मैं दर पे मेरे छोड़ने नहीं आया,
भला मैं कैसे उसे घर से लौटता देखूं.
तमाम उम्र जिसे मैं तलाशता ही रहा,
कभी मैं उसको मुझे भी तो ढूँढता देखूं.

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