Thursday, 17 March 2016

चाहत को संभलने दो...

हसरतो को उलझने दो
उल्फ़त को सुलझने दो।
मुद्दत हो गई खिड़की
से तकते-तकते...
मुझे यूँ ही सपनों
के धुँए मे दहकने दो।
रुसवाई को समझने दो
तन्हाई को संवरने दो।
उमर कट गई यूँ ही
संग चलते-चलते...
अब मुझे खुद ही
रास्तो के फासले
क़रीब लाने दो।
फरमान करने दो
फरियाद पलने दो।
अरसा बीत गया
आस मे तेरे...
विश्वास को यूँ ही
दिल मे दबने दो।
आदत को बदलने दो
चाहत को संभलने दो।
हर लम्हा धीरे-धीरे
गुजरा जा रहा है।
अब तो चाहतो के
मंज़र को लम्हों से
पकड़ने ....दो।
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