मुझ जैसा जो बिखरा था ,
वो मेरा ही कमरा था .
मैं तो था मज़ार जैसा ,
वो भी एक मक़बरा था.
चुभने लगा किनारों को,
पानी बहुत खुरदरा था.
शहर की आगज़नी से दर,
मैं जंगल से गुजरा था .
उस पहाड़ पर था चढ़ना ,
जिस पहाड़ से उतरा था.
चढ़ता हुआ दरिया था मैं,
मुझमें उतरना ख़तरा था.
जिसमें सारी उम्र कटी,
अंधा ,गूंगा बहरा था.

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