जिंदगी दर्द की इक लम्बी सज़ा लगती है,
न दवा लगती है ना कोई दुआ लगती है.
जबसे महबूब ने फेरी है निग़ाहें मुझसे,
जिस्म से मुझको मेरी जान जुदा लगती है.
एक लम्हा भी मुझे पास नहीं बैठाती,
मेरी तन्हाई भी अब मुझसे ख़फ़ा लगती है.
किस तरह जिस्म के मौसम से बचाऊं खुद को,
अब तो साँसों से भी ज़ख्मों को हवा लगती है.
मैं ख़तावार नहीं हूँ ये ख़बर है लेकिन,
वो जो रोता है मुझे मेरी ख़ता लगती है.
जानकर बात ये हँसता है मुक़द्दर मेरा,
चोट इक जैसी मुझे कितनी दफ़ा लगती है.
मुझको दूरी में भी एहसास दुआ देते हैं,
बात ये उसकी मुझे सबसे जुदा लगती है.
न दवा लगती है ना कोई दुआ लगती है.
जबसे महबूब ने फेरी है निग़ाहें मुझसे,
जिस्म से मुझको मेरी जान जुदा लगती है.
एक लम्हा भी मुझे पास नहीं बैठाती,
मेरी तन्हाई भी अब मुझसे ख़फ़ा लगती है.
किस तरह जिस्म के मौसम से बचाऊं खुद को,
अब तो साँसों से भी ज़ख्मों को हवा लगती है.
मैं ख़तावार नहीं हूँ ये ख़बर है लेकिन,
वो जो रोता है मुझे मेरी ख़ता लगती है.
जानकर बात ये हँसता है मुक़द्दर मेरा,
चोट इक जैसी मुझे कितनी दफ़ा लगती है.
मुझको दूरी में भी एहसास दुआ देते हैं,
बात ये उसकी मुझे सबसे जुदा लगती है.
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