Wednesday, 16 March 2016

कभी नोचा ..कभी रौंदा कभी तोडा मुझको

कभी नोचा ..कभी रौंदा कभी तोडा मुझको
कभी भाई कभी बापों ने ..न छोड़ा मुझको
मेरी हालत किसी भीगे हुये दामन सी है
कितने हाथों ने सरे आम निचोड़ा मुझको
कभी बुर्क़ा ,कभी जौहर कभी चिलमन बनकर
खूब मारा तेरी तहज़ीब ने कोड़ा मुझको
कभी फैंका किसी टूटी हुई जूती की तरह
कभी अख़बार की मानिंद मरोड़ा मुझको
मर्द आकाश में उड़ता फिरा पंछी की तरह
और चौखट की हदों में ही सिकोड़ा मुझको

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