हर रात की फिर सुबह होती है...
जिंदगी जंग-ए -जूनून ही सही,
इक न इक दिन सबकी
फतह होती ......है।
इश्क की भी इक कसक होती है..
मोहब्बत मे तकरार-ए-मन ही सही
साहिलों से टकराकर भी...
हर दरिया की मंजिल तय होती है।
दोस्ती मे सपने सी सनक होती है..
दोस्तों मे रंजिस-ए-गम ही सही
दोस्ती के बगैर कहाँ..
रहगुजर होती.....है।
खुदा को भी बन्दे की खबर होती है...
कबर इक खाक-ए-तन ही सही,
पाकीज़ा रूह की ही..
मरकर भी सल्तनत होती है।
हर शक्स की तक़दीर तय होती है...
राह भटकन-ए-धुंध ही सही,
बन-बिगड़कर कभी न कभी
हर करम की तफ्तीश होती है।
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