रेत के ख्व़ाब थे हम नदी से मिले,
इस तरह से तो हम आप ही से मिले.
उम्र तो काट ली अपनी तन्हाई में,
आख़री वक़्त में ज़िन्दगी से मिले.
प्यास कोई कभी भी बुझा न सका ,
कितने दरिया मेरी तिश्नगी से मिले.
सूफियों की दुआ तो रही है यही,
जलता सूरज कभी चांदनी से मिले.
मुझेमें खुद को ही ढूढा करे उम्र भर,
लोग जितने मेरी शायिरी से मिले.
देखना हो अगर मेरे महबूब को,
कोई आकर मेरी बेख़ुदी से मिले.
कोई दिल में न ठहरा कभी इक घड़ी ,,
यूँ तो मिलने को हम हर किसी से मिले.
इस तरह से तो हम आप ही से मिले.
उम्र तो काट ली अपनी तन्हाई में,
आख़री वक़्त में ज़िन्दगी से मिले.
प्यास कोई कभी भी बुझा न सका ,
कितने दरिया मेरी तिश्नगी से मिले.
सूफियों की दुआ तो रही है यही,
जलता सूरज कभी चांदनी से मिले.
मुझेमें खुद को ही ढूढा करे उम्र भर,
लोग जितने मेरी शायिरी से मिले.
देखना हो अगर मेरे महबूब को,
कोई आकर मेरी बेख़ुदी से मिले.
कोई दिल में न ठहरा कभी इक घड़ी ,,
यूँ तो मिलने को हम हर किसी से मिले.
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