आई कभी पसंद सियासत नहीं मुझे ।
देता मेरा ज़मीर इजाज़त नहीं मुझे ।।
टिकती है आफ़ताब पे जा कर मेरी निगाह ।
वैसे भी जुगनुओं से अक़ीदत नहीं मुझे ।।
ले कर कहां तू आई मुझे ऐ मेरी हयात ।
लेने को सांस अब तो इजाज़त नहीं मुझे ।।
मुझको सज़ा मिली है ख़ताएं किए बग़ैर ।
शायद गुनाह की भी ज़रूरत नहीं मुझे ।।
देखा क़रीब से तो हक़ीक़त पता चली ।
मालूम अपने आप की क़ीमत नहीं मुझे ।।
किसके करम से मुझको मिला, जानता हूं मैं ।
हासिल इनायतों की बदौलत नहीं मुझे ।।
मेरी "नज़र" में यूं तो मनाज़िर तमाम हैं ।
मिलने की अपने आप से फ़ुरसत नहीं मुझे ।।
( अक़ीदत=श्रद्धा, मनाज़िर=दृश्य)
देता मेरा ज़मीर इजाज़त नहीं मुझे ।।
टिकती है आफ़ताब पे जा कर मेरी निगाह ।
वैसे भी जुगनुओं से अक़ीदत नहीं मुझे ।।
ले कर कहां तू आई मुझे ऐ मेरी हयात ।
लेने को सांस अब तो इजाज़त नहीं मुझे ।।
मुझको सज़ा मिली है ख़ताएं किए बग़ैर ।
शायद गुनाह की भी ज़रूरत नहीं मुझे ।।
देखा क़रीब से तो हक़ीक़त पता चली ।
मालूम अपने आप की क़ीमत नहीं मुझे ।।
किसके करम से मुझको मिला, जानता हूं मैं ।
हासिल इनायतों की बदौलत नहीं मुझे ।।
मेरी "नज़र" में यूं तो मनाज़िर तमाम हैं ।
मिलने की अपने आप से फ़ुरसत नहीं मुझे ।।
( अक़ीदत=श्रद्धा, मनाज़िर=दृश्य)
No comments:
Post a Comment